हमारे
पूरे जीवन में अनेक लोगों का योगदान होता है। लेकिन हमें अपने पैरों पर खड़ा करने में जिसका सबसे ज्यादा योगदान होता है उसे हम आसानी से भुला देते हैं। सही –गलत की
पहचान कराने वाला, हमेशा हमारे हित में काम करने
वाला एवं एक मार्गदर्शक का रोल अदा करने वाले पिता को समर्पित है मेरी यह कविता:
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वो हैं मेरे पिता…
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उंगली पकड़ के चलना सिखाया जिसने,
बचपन में घोड़ा बनके घुमाया जिसने
कंधे पे बिठा के मेला दिखाया जिसने,
गलती पर भी दिल से लगाया जिसने
वो हैं मेरे पिता…., वो हैं मेरे पिता…।

कहानी सुना के सुलाया है जिसने,
अनुशासन में रहना सिखाया जिसने,
ख़्वाबों को पूरा करना सिखाया जिसने,
बुरी संगतों से मुझको बचाया जिसने,
वो हैं मेरे पिता…., वो हैं मेरे पिता…।
भूल कर भी मुझे नहीं रुलाया जिसने,
सभी सवालों का उत्तर बताया जिसने,
मुसीबतों से लड़ना सिखाया जिसने,
हर पल मेरा साथ निभाया जिसने,
वो हैं मेरे पिता…., वो हैं मेरे पिता…।


7 comments:
Ati Sundar Satya ji
बिल्कुल सही सत्या जी। पिता का मौन प्यार केवल डॉंट फटकार के नीचे दब जाता है ।
जीवन में मां बाप की भूमिका सबसे अहम है
आपने पापा के प्यार को चंद लाइनों में समेटने का
बहुत ही सुंदर प्रयास किया है ...बधाई और शुभकामनाएं ...💐
Very Good
Very true👌
Bahot Achhi Kavita Hai Satya Sir..... Bhaav Bhi Bahot Sundar Hain
Good poem nice
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