जेठ की तपती दोपहरी, ऊँची – ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, फूटपाथ और सब के सब कंक्रीट के। हरियाली का कहीं नमो निशान नहीं। पानी के स्रोत की तो बात की छोडिये। कंक्रीट के इस जंगल रूपी शहर में ऊँची – ऊँची इमारतों के बीच मानो इंसानों की तरह और ऊपर उठने की होड़ सी लगी हो।
सूरज की तपिश से सारा का सारा शहर जलता हुआ सा लग रहा है, मानो सूर्यदेव अपनी तेज किरणों से पानी की हर एक बूंद निगल गए हों। इसी गर्मी में, इन्हीं तपती सड़कों पर भागती हजारों गाड़ियाँ जैसे आग में घी डाल रही हों। ऐसे में इंसान तो सक्षम है अपनी प्यास बुझाने के लिए किन्तु एक निरीह जानवर को अपनी प्यास बुझाने के लिए इन व्यस्त सड़कों पर भटकना उसकी मजबूरी है ।
पानी की तलाश में इधर-उधर दौड़ते –भागते एक कुत्ता काफी थक गया है, तभी उसकी नजर नजदीक के चौराहे पर हरी बत्ती का इन्तजार कर रहे एक पानी के टैंकर से बूंद –बूंद टपक रहे पानी पर पड़ती है।
उसके अन्दर अपनी प्यास बुझाने की एक आशा जगती है और उस पानी को पाने की उम्मीद में वह पूरी ताकत से उस टैंकर की तरफ दौड़ता है। वह कुत्ता अभी उस टैंकर के पास पहुँचने ही वाला था की लाइट ग्रीन हो गई और वह टैंकर अपने गंतव्य की ओर दौड़ने लगा। कुत्तें ने अभी भी उम्मीद नहीं छोड़ी थी। वह पुनः उस टैंकर के पीछे अपनी पूरी ताकत से साथ दौड़ने लगा। उसे विशवास था की वह टैंकर दुबारा कहीं रुकेगा और वह अपनी प्यास बुझा पायेगा।
उस कुत्ते के साथ – साथ इस व्यस्त सड़क पर हजारों गाड़िया भी दौड़ रही है जो इस कुत्ते के सड़क पर आ जाने से परेशान है और हॉर्न बजाये जा रहे है।
अंततः वह कुत्ता टैंकर के बिल्कुल पास पहुँच जाता है और टैंकर के ढक्कन से गिर रहे बूंद –बूंद पानी को लपकने की कोशिश में लग जाता है। सड़क पर दौर रही गाड़ियों के ड्राइवर द्वारा इस कुत्ते को बचाने की कोशिश में टैंकर तथा अन्य कई गाड़िया आपस में टकरा जाती है। टैंकर अपना संतुलन खोकर पलट जाता है और वह कुत्ता उसके नीचे दब जाता है। टैंकर का पानी सड़क पर चारों तरफ फ़ैल जाता है।
पानी का स्पर्श पा कर तपती हुई सड़क भभक उठी और एक सौंधी सी खुशबू वातावरण में फ़ैल गई। इसे सूंघते हुए आस पास के सुछ और जानवर वहां पहुँच गए और अपनी प्यास बुझाने लगे।
दुर्घटना की जानकारी पाते ही पुलिस एवं वचाव दल वहां पहुँच गये और अपने –अपने काम में लग गए, परन्तु उस कुत्ते की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया जो इतनी कोशिश के बावजूद भी प्यासा ही मर गया था ।
सड़क पर दौर रही उन हजारों गाड़ियों में से एक गाडी में बैठा मैं यह सब देख पर काफी व्यथित हो गया और उस पल की कल्पना में डूब गया जब संसाधनों के अभाव में इस कुत्ते की तरह इंसान भी कुत्ते की मौत मरने को मजबूर होगा।
(काल्पनिक कथा)
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