जब भी परीक्षा की
तारीख जारी हो जाती है तो उसमें शामिल हो रहे छात्रों व उनके अभिभावकों को एक
अनचाहा ‘डर’ घेर
लेता है। इस बार भी छात्र व अभिभावक परेशान होने लगे हैं, जो ठीक नहीं। ऐसे समय में क्या करें क्या नहीं, बेहतर परिणाम के लिए क्या सावधानी बरतनी चाहिए , बाता रहे हैं सत्य सरोज।
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आज की बढ़ती गला काट
प्रतियोगिता ने बच्चों से ज्यादा उनके अभिभावकों को चिन्ता में डाल दिया है। कोई
भी माता-पिता यह नहीं चाहता कि उसका बच्चा परीक्षा में फेल हो या कम नंबर प्राप्त
करें। अभिभावक की यह मानसिकता होती है कि जो काम वे खुद नहीं कर सके, वह उनका बच्चा करे। वे अपने बच्चों से काफी
ज्यादा अपेक्षा रखते है। कई बार तो अभिभावक इसे अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना लेते
है।
अभिभावक की तरफ से
बच्चों को बात-बात पर रोक-टोक किया जाता है। टीवी मत देखो, दोस्तों से बात मत करो, खेलना बन्द करो आदि दबाव डाला जाता है। दूसरे
बच्चों से उनकी तुलना भी की जाती है जो ऐसा कोई भी अतिरिक्त काम नहीं करते और सारा
दिन पढ़ाई में लगे रहते हैं। इस प्रकार के अनावश्यक दबाव के कारण बच्चे तनाव से
ग्रसित हो जाते हैं। उनके अंदर यह डर घर कर जाता है कि अर वे फेल हो गए या उम्मीद
से कम नम्बर आए तो क्या होगा? उन्हें अपने अभिभावक
से अपमानित होना पड़ेगा अथवा अच्छे कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल पाएगा आदि जैसी
चिंताएं घर कर जाती हैं। इसके आलावा परीक्षा को लेकर कई अन्य शंकाएं जैसे अगर पेपर
कठिन हुआ तो क्या करुंगा, अगर पढ़ा हुआ याद नहीं रहा तो क्या करुंगा आदि भी
सताती रहती है।
इस प्रकार बच्चा
मानसिक और भावनात्मक दबाव का शिकार हो जाता है, जिसका
प्रभाव उसके प्रदर्शन पर साफ दिखता है। परिणामस्वरूप उसका रिजल्ट उम्मीद से भी
काफी खराब हो जाता है।
कई परिवारों में घर
के सदस्यों के बीच छोटी-छोटी बातों पर भी झगड़ा होता रहता है। इससे घर का माहौल तनावपूर्ण बन जाता है, जिसका असर घर के बच्चों पर भी पड़ता है। अत: अपने
बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए कम से कम परीक्षा के दिनों में घर के आपसी झगड़ों
से दूर रहे। शांति का माहौल कायम करें तथा बच्चें के साथ प्यार पूर्वक पेश आएं।
हार-जीत तो चलती ही
रहती है। यह जरूरी नहीं है कि सभी बच्चे 95 या
98 नंबर ही प्राप्त करे। परीक्षा का परिणाम बच्चों के मानसिक एवं पारिवारिक स्थिति से भी
प्रभावित होता है। यदि परिवार में किसी प्रकार की समस्या है तो इससे सकारात्मक
तरीके से निपटने की कोशिश करनी चाहिए।
परीक्षा परिणाम खराब
हो जाने से जिंदगी नहीं रूकती। दुबारा प्रयास करना चाहिए और हो सकता है परिणाम
अच्छा हो। हताश हो जाना इसका निवारण नहीं है। परीक्षा के डर एवं खराब परिणाम से
हताश हो कर कई बच्चें अपनी जान गवां देते हैं, जो
अत्यधिक अपेक्षाओं का परिणाम है।
छात्रों को चाहिए कि
सकारात्मक सोच के साथ एक निश्चित रूटीन पर अमल करते हुए अपनी तैयारी पूरी तनमयता
के साथ करें। परिवार में छोटी-मोटी समस्याएं आती रहती हैं, जिसका निदान घर के बड़ों को करना है और बच्चों को
इससे दूर रह कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। अगर घर की किसी गतिविधि से बच्चों
की पढ़ाई प्रभावित होती है तो उन्हें इस बारे में अपने अभिभावक से बात करनी चाहिए।
परीक्षा के दौरान
प्रकृति के जितना करीब रहें, उतना ही अच्छा है।
सुबह जल्दी उठकर सैर करना चाहिए तथा रात को सोने से पहले भी थोड़ी देर खुली हवा में
टहलना चाहिए। कुछ देर योग करना मानसिक शांति के लिए बहुत जरूरी है। हरी सब्जी, साग, फल
एवं अन्य प्रकृतिक पदार्थ भोजन में शामिल करने से बीमारियां दूर रहती है और दिमागी
तनाव भी नहीं होता।
बच्चों को चाहिए कि वह
कुछ दिनों के लिए अनावश्यक कामों को छोड़ कर रूटीन के अनुसार पढ़ाई करें। पूर्व में
पढ़ी गई सामग्रियों को दूबारा रिवाइज करें तथा कठिन प्रश्नों को बार-बार
पढ़ते रहें। महत्वपूर्ण चार्ट, फार्मूला, डायग्राम, मैप आदि को अपने स्टडी रूम में दीवार पर टांग दें, ताकि बार-बार देखते रहने
से वह हमेशा आपके जेहन में रहे। यादि आप एकाग्रता के साथ पढ़ाई करते हुए इन
छोटी-छोटी बातों पर अमल करते हैं तो सफलता निश्चय ही आपके कदम चूमेगी।
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अभिभावक क्या करें,और क्या
नहीं, छात्रों के लिए आवश्यक
सुझाव तथा परीक्षाहाल में क्या करें, जानने के
लिए अगले अंक का इंतजार करें।