Saturday, 13 January 2018

सर्दी


My new poem based on winter season.


*सर्दी की दस्तक*


होने लगे दिन अब छोटे,
धरती ने बदली है चाल
खेतों ने बदली है रंगत,
सर्दी ने है किया बेहाल।

धूप गुनगुनी जाड़े की,
सबके दिल को हर्षाए
बैठ अलाव के आगे हम,
गीत पुराने दिन के गाये।

मक्के की रोटी के साथ,
मजेदार सरसो का साग
गर्म पकोड़े चाय के साथ,
सर्दी जाती जैसे भाग।

मौसम ने ले ली है करवट,
सूरज पस्त होने लगा
बर्फ से ढका हुआ है पर्वत,
आकाश भी रोने लगा।

आसमान में छाया कोहरा,
दिन में जैसे रात हुई
घर के अंदर कैद हो गए,
दुनियादारी बन्द हुई।

ठंढ से जनता त्रस्त हो गई
हमें न इतना तड़पाओ
मनभावन मौसम को ले कर,
हे बसंत तुम जल्दी आओ ।