Saturday, 30 November 2024

फेसबुक फ्रेंड

 

फेसबुक फ्रेंड

मैं अपना फेसबुक अकाउंट रोज चेक करती हूँ । इसके लिए मै प्राय: अपने लैपटॉप का प्रयोग करती हूँ तथा यदा-कदा मोबाइल के माध्यम से भी फेसबुक चेक कर लेती हूँ। पिछले तीन-चार दिनों से अधिक व्यस्तता के कारण मुझे लैपटॉप ऑन करने का मौका नहीं मिला तथा मोबाइल में कुछ तकनीकी समस्या होने के कारण मैं उसका भी प्रयोग नहीं कर पाई। 
कल रविवार की छुट्टी है और काम का दबाव भी नहीं है। यह सोच कर ऑफिस से आते ही मैंने अपना फेसबुक पेज ओपन किया और दोस्तों के पोस्ट देखने बैठ गई। दो तीन दोस्तों के पोस्ट देखते और लाइक करते हुए मैं आगे बढ़ती चली गई। अगला मैसेज रिया का था, जिसे अभी कुछ मिनट पहले ही पोस्ट किया गया था। इसे पढ़कर मैं सन्न रह गई। हमेशा खुश रहने वाली तथा व्यंगात्मक मैसेज भेजने वाली रिया का मैसेज आज आशा के विपरित था। “लोगों ने मुझे रिजेक्ट किया, आज मैं सबको रिजेक्ट करती  हूँ। गुड बाई !”  इसके साथ एक फोटो भी पोस्ट किया गया था, जिसे देख कर मैंने तुरंत उसे ऑनलाइन ढूँढना शुरू कर दिया। अपनी आदत के अनुसार वह ऑनलाइन चैट के लिए उपलब्ध थी। मैंने चैटिंग शुरू कर दी।
लुधियाना में रहने वाली रिया की पिछले महीने ही एक एन.आर.आई. लड़के परविंदर से सगाई हुई थी। वह बहुत खुश थी। सगाई में शामिल होने के लिए मेरे पास भी निमंत्रण पत्र आया था, किन्तु व्यस्तता के कारण मैं कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाई। अगले महीने की दस तारीख को उसकी शादी होने वाली थी और वह हमेशा के लिए कनाडा शिफ्ट होने वाली थी, किन्तु इसी बीच पता चला की परविंदर ने कनाडा की एक स्थानीय लड़की से शादी कर ली है। यह खबर सुन कर वह बिल्कुल टूट गई। उसके सारे सपने कांच की तरह बिखर गए। वह बिल्कुल अकेली हो गई। इस मुश्किल घड़ी में उसे सहारा देने वाला कोई नहीं था। उसके मम्मी-पापा भी पिछले चार-पांच दिनों से कहीं बाहर गए थे और वह अपना गम फेसबुक के माध्यम से दोस्तों से शेयर कर रही थी। किन्तु उसे कहीं से भी भावनात्मक सपोर्ट नहीं मिल पा रहा था। इस कारण वह जीवन से निराश हो चुकी थी और इस दुनिया में नहीं रहना चाहती थी। चैटिंग के दौरान मैंने महसूस किया कि उसे मोरल सपोर्ट की सख्त जरूरत है, वरना वह बिल्कुल ही टूट जाएगी।
मैंने टैक्सी बुलाई और लैपटॉप पर चैटिंग करते हुए रिया के घर की तरफ रवाना हो गई। चंडीगढ़ से लुधियाना तक के दो घंटे के सफर के दौरान मैंने लगातार चैटिंग करते हुए उसे व्यस्त रखा।
मैं उसके दरवाजे के बाहर खड़ी थी। रिया को शायद दरवाजा बंद करने का भी होश नहीं रहा। हल्के धक्के से ही दरवाजा खुल गया। मैं रिया को ढूंढ़ते हुए उसके बेडरूम में पहुंच गई। वह लैपटॉप पर मुझसे चैटिंग में व्यस्त थी, किन्तु कमरे का नजारा सब कुछ बयान कर रहा था। दुपट्टे से बना हुया फांसी का फंदा पंखे से लटक रहा था तथा बेड पर प्लास्टिक का एक छोटा-सा स्टूल रखा हुआ था। मुझसे चैटिंग शुरू करने से पहले वह सुसाइट करने की पूरी तैयारी कर चुकी थी। मुझे देखते ही वह मुझ से लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी। कहते है कि आंसू के माध्यम से हमारे सारे दर्द पानी बन कर निकल जाते हैं। रिया के दर्द भी आंसुओं के माध्यम से निकलते जा रहे थे।
मैंने अपने दोस्त को मौत के मुंह से निकाला था। किसी के लिए कुछ अच्छा करने पर कितना शुकून मिलता है, उसका एहसास पा कर मैं आनंदित हो रही थी। रिया के दर्द के आंसुओं के साथ मेरे खुशी के आंसू मिश्रित हो रहे थे।

Tuesday, 5 November 2024

आस्था का महा पर्व – छठ

 

आस्था का महा पर्व – छठ


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आस्था का महापर्व "छठ पूजा" की शुरुआत हो चुकी है। 

छठ लोकपर्व मुख्य रूप से  बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। यह कार्तिक शुक्ल की षष्ठी एवं सप्तमी को मनाया जाता है। सूर्य षष्ठी व्रत होनेके कारण इसे छठ कहा गया है। 
 इस क्षेत्र के प्रवासियों द्वारा यह पर्व देश - विदेश के अन्य क्षेत्रों मे भी उल्लासपूर्वक मनाया जाता है। पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं।

क्यों मनाते हैं छठ पर्व

छठ व्रतके संबंधमें अनेक कथाएं प्रचलित हैं।  कहा जाता है की कि साधु की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए जब महाराज पांडु अपनी दोनों पत्नियों के साथ वन में दिन गुजार रहे थे, उन्हीं दिनों महारानी कुंती ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से सरस्वती नदी में सूर्य की पूजा की थी। इससे कुंती पुत्रवती हुई। इसलिए संतान प्राप्ति के लिए छठ पर्व का बड़ा महत्व है। धीरे धीरे यह प्रचलन में आ गया।


एक अन्य मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है की महाभारत का एक प्रमुख पात्र कर्ण, तात्कालिन अंग देश यानी आज के भागलपुर (बिहार) का राजा था।  वह नियम पूर्वक कमर तक पानी में जाकर सूर्य देव की आराधना करता था और उस समय जरुरतमंदों को दान भी देता था। कार्तिक शुक्ल षष्ठी और सप्तमी के दिन कर्ण, सूर्य देव की विशेष पूजा किया करता था।  अपने राजा की सूर्य भक्ति से प्रभावित होकर अंग देश के निवासी सूर्य देव की पूजा करने लगे। धीरे-धीरे सूर्य पूजा का विस्तार पूरे बिहार और पूर्वांचल क्षेत्र तक हो गया।

सामाजिक मान्यता

चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में शुद्धता का विशेष महत्व है।  इसे बहुत ही सादगी और पवित्रता से मनाया जाता है। इसमें बाँस से बने सूप एवं टोकरियों तथा मिट्टी के बर्तनों का ही प्रयोग किया जाता है। पर्व शुरू होने से पहले पूरे घर की अच्छी तरह सफाई की जाती है। फिर पूजा के लिए प्रयोग होने वाली सभी सामग्रियों को बाजार से लाने के बाद अच्छी तरह धो कर ही रखा जाता है। पूजन सामग्री बेचने वाले दूकानदार भी शुद्धता का विशेष ध्यान रखते है। यह त्योहार सामूहिक रूप से लोगों को स्वच्छता के लिए प्रेरित करता है।


                                                                       यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गई पूजा पद्धति है। इसके केंद्र में किसान और ग्रामीण जीवन है।  इस व्रत के लिए किसी पंडित या गुरु की जरूरत नहीं पड़ती है। इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है। सामूहिक रूप से नगरों की सफाइ, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबंधन, तालाव या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था आदि की जाती है । इस उत्सव में आरंभ से अंत तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा भाव और भक्ति भाव से किए गए सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है।

व्रत का आरंभ

चार दिवसीय यह त्योहार कार्तिक शुक्ल चतुर्थी “ नहाय खाय” से आरंभ होता है।   व्रती शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं।  दूसरे दिन को ‘खरना’ कहा जाता है । इस दिन व्रतधारी दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को गुड से बने हुए चावल की खीर एवं रोटी छठी मैया को प्रसादके रूप में अर्पित करते हैं और व्रती इसी प्रसाद को खाते है एवं अन्य लोगों को बांटा जाता है। इसके बाद अगले दो दिन तक व्रती कूछ नहीं खाते  हैं।




तीसरे दिन अर्थात कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में शुद्ध देशी घी एवं आंटे का ठेकुआ, चावल के आंटे का  लड्डू, आदि बनाए जाते हैं।  इसके अलावा कई प्रकार के मौसमी फल, गन्ना, नारियल, केला आदि भी प्रसाद के रूप में शामिल होता है। शाम को पूरी तैयारी कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्त होते हुये सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा हो, पानी में खड़े हो कर सामूहिक रूप से अर्घ्य देते हैं । इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले जैसा दृश्य बन जाता है।


चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह को व्रती पुनः वहीं इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। सुबह में उगते हुये सूर्य को अर्घ्य के साथ जल और दूध भी अर्पण किया जाता है। अंत में व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं। इसके बाद प्रसाद वितरित किया जाता है।

इस व्रत में नए चावल और गुड़ का खीर बनाने की परंपरा है।  गुड़ को चीनी से शुद्घ माना गया है। यही कारण है कि छठ पर्व में चीनी की बजाय गुड़ की खीर बनाई जाती है। इसका एक वैज्ञानिक कारण भी हैं। गुड़ की तासीर गर्म होती है और यह सुपाच्य होता है। गुड़ का सेवन व्रती को आंतरिक उर्जा प्रदान करता है जिससे इस लंबे व्रत को पूरा करने का बल मिलता है।

यह प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। ‘शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को न सौंप दें । घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व करने वाली महिलाओं को संतान की प्राप्ति होती है और घर मे सुख समृद्धि आती है।
                   
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लेख एवं फोटो - सत्य सरोज
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