Monday, 8 May 2023

Happy Mother's Day. .....



माँ तुम्हारे चरणों में 
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दुनिया के इस भीड़ में,
याद बहुत आती है माँ।  
अंजान सफर के तेज धूप में,
सुरमई छांव बन जाती है माँ।

लंबे सफर का घना अंधेरा,
जब भी मुझे डराता है,
बचपन में सिखाई तेरी बातें,
मुझको राह दिखता है।

इस जालिम दुनिया ने मुझको,
जब जब है दुख दर्द दिया,
तुम्हारे स्नेहिल स्पर्श ने ही,
सारे दुख दर्द का नाश किया ।

जब मैं था बड़ी मुसीबत में,
भगवान को ढूँढा मंदिर में,
भगवान से पहले माँ आई,
जो है मेरे मन मंदिर में।

जाने क्यों लोग इस दुनिया में,
भगवान को पूजा करते हैं,
जन्नत तो मैंने पाया है,
माता के पवन चरणों में ।  
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Saturday, 25 March 2023

एक लाइक तो दे दो यार।👍🏼👍🏼👍

एक लाइक तो दे दो यार।
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मैं ने डाली है सेल्फी,
लाइक का है इंतजार,
मेरा दिन बन जायेगा,
गर मिला आपका प्यार,
एक लाइक तो दे दो यार।

आप का एक एक लाइक,
है एक अनमोल उपहार,
साथ में गर कमेंट भी दे दो,
हो जाएगी मेरी नैया पार,
एक लाइक तो दे दो यार।

सौ दोस्तों के लाइक से
मैं खुश होउंगा अपार,
पांच सौ गर पहुँच गया,
होगा मेरा सपना साकार,
एक लाइक तो दे दो यार।

मेरे दोस्त के पोस्ट को
मिला मित्रो का  प्यार,
दो सौ लाइक आ चुके,
बस घंटे का  इंतजार
एक लाइक तो दे दो यार।

मेरी बेचैनी बढ़ रही,
कर रहा मुझे बीमार
लगता है हो जाऊंगा,
अवसाद का मैं शिकार
एक लाइक तो दे दो यार।

मेरी खुशी के खातिर
न करना तुम इनकार,
इससे पहले की तोड़ूँ दोस्ती,
कर दो मुझ पर उपकार,
एक लाइक तो दे दो यार।
🙏💐


बचपन के दिन
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माँ की आँखों का तारा,
थे पापा के  राजदुलारे,
बचपन के दिन कितने प्यारे,
आज बने हैं सपने सारे.

छोटी छोटी आँखें अपनी,
पर  सपने  थे  बड़े बड़े,
छोटे छोटे खेल खिलौने,
लगते थे  सबसे प्यारे,
गम नहीं कोई दुनिया का,
थी सारी खुशियाँ पास हमारे,
बचपन के दिन कितने प्यारे.









न टीवी न थी बिजली,
वो रेडिओ का ज़माना था,
पढ़ने बैठे छत पे रात को,
लालटेन का मात्र सहारा था,
चाहत थी चाँद को पाने की,
पर न  रॉकेट  पास हमारे,
बचपन के दिन कितने प्यारे.
  










खेल था गिल्ली डंडे का,
कंचों का फैला मेला था,
नीले  आसमां  में हमारे,
सतरंगी पतंग का रेला था,
बागें थी अम्बियों से लदी ,
और  गुलेला  पास हमारे,
बचपन के दिन कितने प्यारे.








न खबर थी शाम की,
न दिन का ठिकाना था,
दादी की कहानियों का,
भरा  पूरा  खजाना था,
चाचा चाची, दादा दादी,
रहते थे सब साथ हमारे,
बचपन के दिन कितने प्यारे.
आज बने हैं सपने सारे.







Wednesday, 22 February 2023

बीमारी के बहाने .... ( Bimari ke bahaane ...)


 

 

बीमारी के बहाने ....

 

 

(शीर्षक को पढ़कर अन्यथा नहीं लें। इस लेख में बीमारी को बहाना का माध्यम नहीं बताया गया है। )

   ( कुछ मित्रों के व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित एक प्रेरक लेख )

 

अपने व्यस्त और भागदौड़ वाली जिंदगी में हम कई चीजों को अनदेखा कर देते हैं। दोस्तों को भुला देते हैं। रिश्तेदारों का कुशल  पूछने का हमारे पास समय नहीं होता ।  रिश्तेदारों से संबंध बढ़ाने की तो बात ही छोड़ दीजिए। आए दिन मुझे कुछ करीबी रिश्तेदारों तथा अपने परिवार के दूसरे सदस्यों के माध्यम से यह शिकायत सुनने को मिलती रहती थी कि मैंने अमुक दोस्त का फोन रिसीव नहीं किया, तो अमुक  रिश्तेदार से बात नहीं की, आदि।  मुझसे बात नहीं होने के कारण वह अपना संदेश तथा आवश्यक काम घर के किसी अन्य सदस्य को नोट करवा देते थे ताकि किसी तरह उनका संदेश मुझ तक पहुँच जाए।


प्रायः ऐसा ही होता था और संदेश पाकर मैं  उचित कार्यवाही कर देता था, लेकिन उनसे बात फिर भी नहीं हो पाती थी।  परिवार के अन्य सदस्य ही वार्तालाप का माध्यम बनते थे।  समय निकालकर एकाध  बार बात करने की कोशिश भी की तो  “नेटवर्क बिजी”  की दीवार बीच में खड़ी हो जाती थी।

 

खैर, किसी तरह रिश्तेदारी भी निभ रही थी  और पुराने दोस्त भी दोस्ती तोड़ने को तैयार नहीं थे। आए दिन उनका मिस्ड कॉल, उनको भूलते हुए मेरे मानस पटल पर अपनी ना मिटने वाली मौजूदगी दर्ज करा ही देते थे। अपने व्यस्त कार्यक्रम में यह सोच कर, कि थोड़ी देर बाद बात करूंगा या कल बात करूंगा या संडे को बात करूंगा,  करते-करते हफ्ते और महीने कब बीत जाते पता ही नहीं चलता।

 

इस व्यस्त दिनचर्या में अपने कुछ व्यक्तिगत काम भी पीछे छूट जाते थे।  अब काम तो काम है। अगर करते रहो तो कभी खत्म नहीं होता और ना करो तो कोई काम ही नहीं दिखता। खैर आदत से मैं पहली कैटेगरी में आता था। फलतः मेरा काम कभी खत्म ही नहीं होता था और व्यक्तिगत काम पीछे छूट जाते।

ऐसा कहा गया है कि शरीर और दिमाग को भी पर्याप्त आराम की जरूरत पड़ती है और अगर हम उसे आराम नहीं देते तो इसका परिणाम हमें बीमारी के रूप में मिलता है।  अगर बाकी सारे अंग ठीक से काम कर रहे हैं तो शरीर खुद को आराम देने के लिए “बुखार” को आमंत्रित करता है जो बिना कष्ट उठाए कभी भी चला आता है।

अभी परसों की ही तो बात है जब बुखार देवता बिना बुलाए ही मेरे शरीर के अंदर विराजमान हो गए थे।
आरंभ में मुझे उनका आना थोड़ा अजीब और कष्टदायक लगा। मुझे उन कामों की चिंता हो रही थी जिसका परिणाम अभी आना था तथा उन कामों की भी चिंता सता रही थी जो मैं बीमार होने के कारण नहीं कर पा रहा था।  खैर बुखार देवता जब आए थे तो उन्होंने भी अपना काम तो पूरा करना ही था। अतः वे अपने काम में लग गए।

 जैसे ही आस पास के मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों को मेरे बीमार होने का पता चला, वह मेरी कुशलता जानने मेरे घर आने लगे। प्रायः ये लोग मिठाई लेकर आते थे किंतु इस बार वह मेरे लिए तरह तरह के फल और फूल लेकर आ रहे थे। ऐसा नहीं है कि मेरे घर में इनकी कमी थी किंतु आगंतुक इसे सुदामा की तरह तुक्ष भेंट समझ कर लाते थे।

 इस आराम प्रवास के दौरान न कहीं आना–जाना था और न ही कोई मेहनत वाला काम करना थाअतः इस समय का सदुपयोग मैंने भूले बिसरे गाने सुनने में और भूले बिसरे रिश्तेदारों, मित्रों से बात करने में किया। मैं पुरानी यादों के खो गया ...

 पिछले वर्ष यात्रा के दौरान एक मित्र राकेश जी से जान पहचान हुई थी  जो समाज सेवा से जुड़े हुए हैं। उनसे मिलकर समाज के लिए कुछ करने की मेरी भी इच्छा हुई l कुछ दिनों तक तो इस विषय पर वार्तालाप होती रही  किंतु बाद में अति व्यस्तता के कारण मैं उनके संपर्क में नहीं रहा और समाज सेवा का काम ठंढे  बस्ते में चला गया।  परंतु अपने इस आराम प्रवास के दौरान मैंने इसी तरह के कुछ भूले बिसरे काम तथा लोगों को याद करने की कोशिश की और उनके साथ फोन पर वार्तालाप की । राकेश जी के साथ इसी दौरान मुलाकात भी हुई और मेरी दबी हुई इच्छा ने रफ्तार पकड़ ली।

 इस आराम प्रवास के दौरान मैंने अपने मनोरंजन के लिए अखबारों और पत्रिकाओं को अपना दूसरा साथी बनाया। अखबार में छपी गांव की एक मर्मस्पर्शी कहानी ने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया। पता करके मैंने उस लेखक का फोन नंबर प्राप्त कर लिया और उनको फोन करके इतनी अच्छी कहानी के लिए उन्हें बधाई दी। बातों- बातों में पता चला कि यह लेखक महोदय मेरे कॉलेज के दिनों के मित्र थे। लेखन में रुचि के कारण वे अखबार में रिपोर्टिंग करने लगे और धीरे-धीरे लेखक भी बन गये। उनकी कई किताबें भी छप चुकी है। उनकी इस अभूतपूर्व सफलता ने मेरे अंदर के सो चुके कलाकार को जगा दिया।

 अभी पिछले हफ्ते ही तो अमित का फोन आया था।  उसने अपनी शादी तय होने की सूचना दी थी और अपने घर बुलाया था। आदतन मैंने “अगले हफ्ते देखता हूँ”  कह कर उसे टाल दिया था। पिछले एक साल के अंदर यह सातवां -आठवां अवसर होगा किंतु अमित फोन करके घर आने का निमंत्रण देने से नहीं चूकता था। वह तो खुद आकर मुझे ले जाने को तैयार होता था किंतु मैं ही उसको आने से मना कर दिया करता था। परंतु आज ना मैं ही उसे मना कर सका और ना वो ही अपने आप को रोक सका।

 वह मेरे घर आकर मुझे “गेट वेल सून”  का संदेश के साथ पुनः अपने घर आने का निमंत्रण दे गया। ऐसे दोस्तों और रिश्तेदारों को मैं कैसे इतने दिनों से नजरअंदाज कर रहा था,  मैं खुद अचंभित था। इस आराम प्रवास ने मुझे दोस्ती और रिश्तेदारी के नए मतलब समझा दिए थे।  इसी तरह कई पुराने मित्रों और रिश्तेदारों से भी मुलाकात हुई जिससे मुझे लगा कि मेरी दुनिया तो बहुत बड़ी है। मैं ही कूप मंडूक की तरह अपने काम से बाहर नहीं निकल पा रहा हूँ।

 इसके बाद मैंने प्रण लिया कि मैं सप्ताह में एक दिन नियमित रूप से बाहर की दुनिया से भी संपर्क स्थापित करता रहूंगा।

 अपने इस  4 दिन के बीमारी के अवकाश के दौरान मैंने देखा की मेरी कुछ लेनदारी भी छूट गई थी। मोबाइल के मैसेज देखने से पता लगा की कुछ इनकम टैक्स रिटर्न आए थे तथा कुछ लोगों ने मेरे अकाउंट डिटेल मांगे थे, उन पैसों को वापस करने के लिए जिसे दे कर मैं खुद भी भूल गया था।  मेरी यह सोच थी कि किसी को जरूरत के वक्त पर अगर आप कुछ देते हैं तो उसे कहीं नोट करके ना रखें और भूल जाए कि वह पैसा वापस आएगा। अन्यथा आप दुखी रहेंगे क्योंकि देने वाला तो अपनी सुविधा अनुसार ही देगा।

 अगर हम वापसी की उम्मीद नहीं रखेंगे तो हमें दुख नहीं होगा और अगर वह धन वापस आ गया तो खुशी जरूर होगी।  इसी तरह अगर हम अन्य तरीके से भी किसी की मदद करते हैं तो उससे वापसी की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। कई बार ऐसा होता है कि जितना हमने किया होता है, उससे कई गुना ज्यादा हमारे जरूरत के समय कोई अनजान हमारी मदद कर जाता है। अतः इस वाक्य का हमेशा अनुसरण करना चाहिए कि “नेकी कर, दरिया में डाल।“

 मेरी देनदारी कोई खास नहीं थी । हाँ, कुछ इंश्योरेंस के बिल, टेलीफोन बिल, बिजली बिल इत्यादि थे जिसकी अंतिम तिथि जा चुकी थी और भुगतान नहीं हो पाया था। अतः इस अवकाश के दौरान उसका भी निवारण हो गया।

 पुराने जमाने में बुखार और कुछ अन्य बीमारियों को विधि- विधान के साथ विदा किया जाता था। किंतु जैसे-जैसे मेडिकल साइंस ने तरक्की की वैसे वैसे हम पुराने रिवाजों को भूलते चले गए। आज स्थिति ऐसी हो गई है कि बीमारी के लक्षण परिलक्षित होते ही हम एंटीबायोटिक दवा ले लेते हैं और फिर से काम में लग जाते हैं।  हम शरीर और दिमाग को आराम करने का मौका ही नहीं देते।

 विज्ञान के सताए बेचारे शरीर और दिमाग भी हमारे साथ “पैसे” और “नकली ख़ुशी” की तलाश में, अंधी और कभी न खत्म होने वाली दौड़ में शामिल हो जाते हैं। हम यह सोचना छोड़ देते हैं कि क्या हम इस तरह दौड़ते हुए अपनी मंजिल को प्राप्त कर सकते हैं?  या फिर हामारे पास यह सब सोचने का समय ही नहीं होता। कई बार हमारी महत्वाकांक्षा हमें ऐसा करने नहीं देती।

 चार दिनों तक फलाहार के बाद आज घर वालों ने “पंथ” खिला दिया है और आधिकारिक रूप से डॉक्टर ने भी फिटनेस सर्टिफिकेट दे दिया है। मेरा शरीर और दिमाग भी आराम करके फ्रेश हो चुका है और अगली पारी खेलने को तैयार है।

 आदत के अनुसार कल से मैं फिर व्यस्त हो जाऊंगा और फिर लोगों से बात हो पाएपता नहीं। अतः मैंने सोचा की “बीमारी के बहाने” मुझे जो अध्यात्मिक, पारिवारिक और सामाजिक फायदा हुआ है उसे आपको बताता चलूं और अनायास ही मेरी उंगलियों ने इसे आप तक पहुँचाने के लिए कलम का सहारा ले लिया।

                                                  ***

 

Wednesday, 25 January 2023

गणतंत्र दिवस


 संविधान निर्माण और उसकी प्रक्रिया 


आजादी के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में देश में आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है।  हमारा देश 15 अगस्त 1947 ईo को आजाद हो गया था परन्तु अपना संविधान नहीं होने का कारण देश 15 अगस्त 1947 ईo  से संविधान लागू होने तक एक ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में ही जाना जाता था और इसका प्रशासन गवर्नर जनरल के हाँथ में था । 26 जनवरी 1950 को भारत को गणतंत्र घोषित किया गया जिसका अर्थ है- भारत का राष्ट्राध्यक्ष “राष्ट्रपति”  निर्वाचित होगा न कि आनुवांशिक।‍ 

                  

 आइये जानते हैं की हमारे संविधान का निर्माण कैसे हुआ ? 


जब अंग्रेजो द्वारा 1935 ईo में “भारत सरकार अधिनियम -1935” लागू किया जा रहा था उसी समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के द्वारा देश के लिए अलग संविधान बनाने की मांग उठी थी परन्तु ब्रिटिश सरकार ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया । कुछ वर्ष वाद द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया और विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद इंग्लैंड  में सरकार बदल गई । इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष और बदली हुई परिश्थिति में अंग्रेजों ने  यह महसूस किया की भारत पर अब ज्यादा दिन शासन नहीं किया जा सकता और उसे आजाद कर देना ही उचित है । अतः भारत को शांतिपूर्ण सत्ता हस्तानान्तरण के उपायों एवं संभावनाओं को तलाशने के लिए सरकार द्वारा एक तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय शिष्टमंडल भेजने की घोषणा की गई  जिसे “कैबिनेट मिशन” का नाम दिया गया । इस कमेटी ने मई 1946 में अपनी रिपोर्ट सरकार को दी जिसमें स्वतंत्रता से पहले भारत के लिए एक अलग संविधान निर्माण की बात कही गई और उसके लिए विस्तृत योजना प्रस्तुत की गई । 

                

              संविधान सभा का गठन 

कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर  भारतीय संविधान का निर्माण के लिए एक संविधान सभा का गठन किया गया। संविधान सभा का निर्वाचन परोक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व तथा पृथक साम्प्रदायिक निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर 1934 ई॰ में गठित प्रांतीय विधान सभाओं द्वारा किया गया। इस समय देश में कुल 542 देशी रियासतें थी।

 संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन 09 दिसंबर 1946 ई. को हुआ। इसी दिन डाo सच्चिदानंद सिन्हा को संविधान सभा का अस्थाई अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 11 दिसंबर 1946 को डाo राजेन्द्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया। इस संविधान सभा का संवैधानिक सलाहाकार श्री बी.एन. राव को नियुक्त किया गया था। संविधान सभा ने संविधान निर्माण के कार्य को तीव्र गति से और समय पर पूरा करने के लिए 22 समितियों का निर्माण किया था जिसमें प्रारूप समिति सबसे प्रमुख थीं। इसका काम संविधान की रूपरेखा तैयार करना था।  29  अगस्त 1947 ईo को गठित इस समिति के अध्यक्ष डाo भीमराव आंबेडकर को बनाया गया ।     

 आरंभ में संविधान सभा के कुल 389 सदस्य थे। 15 अगस्त 1947 ईo को आजादी की घोषणा और पकिस्तान के अलग देश बन जाने के कारण  पाकिस्तान के लिए अलग संविधान सभा गठित हो गया और भारतीय संविधान सभा में सदस्यों की संख्या घटकर 299 हो गई। 

डाo भीमराव आंबेडकर द्वारा तौयार  संविधान का प्रारूप,  संविधान सभा के अध्यक्ष के सम्मुख 4 नवम्बर 1949 ई. को लाया गया । स्वाधीन भारत के संविधान पर सभा के अध्यक्ष डाo राजेन्द्र प्रसाद ने 26 नवम्बर 1949 को हस्ताक्षर किये। 26 नवम्बर 1949 को 284 सदस्यों ने संविधान पर हस्ताक्षर किये। इसी दिन संविधान सभा ने संविधान को अंगीकृत, अधीनियमित, और आत्मार्पित किया। नागरिकता, निर्वाचन और अंतरिम संसद से संबंधित सभी उपबंध (अनुच्छेद) तत्काल प्रभाव से (26 नवम्बर 1949) को  लागु कर दिये गए। शेष संविधान को 26 जनवरी 1950 से लागु किया गया ।  इसलिए अनुo 394 के अनुसार 26 जनवरी 1950 को संविधान की प्रवर्तन की तिथि कहते है। 26 जनवरी 1950 को संविधान सभा का अंतरिम संसद में परिवर्तन कर दिया गया और भारत को एक गणराज्य घोषित किया गया ।


भारतीय संविधान के श्रोत :

संविधान निर्माताओं ने इस बात का विशेष ध्यान रखा की भारत का संविधान दुनिया में सबसे श्रेष्ट हो और जनता के हित में हों । इसके लिए उन्होंने विश्व के विभिन्न देशों के संविधान का अध्ययन किया और उन में से सभी अच्छी बातों का समावेश भारत के संविधान में किया । इसका मुख्या श्रोत “ 1935 का भारत सरकार अधिनियम” था । इसकी लगभग 200 धाराओं को कुछ अक्षरशः तथा कुछ वाक्यों में थोड़े से परिवर्तन के बाद ज्यो-का-त्यों अपना लिया गया है। 1928 ईo का नेहरु रिपोर्ट से भी कुछ उपबंधों की ग्रहण किया गया । इसके आलावा अन्य देशों की जो मुख्य कानून ग्रहण किये गए वो इस प्रकार है 

ब्रिटिश संविधान सेः- संसदात्मक शासन प्रणाली, संसद प्रक्रिया, विधि निर्माण, एकल नागरिकता एवं संसदीय विशेषाधिकार।

आयरलैंड के संविधान से :- नीति निर्देशक तत्व, राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के सदस्यों का मनोनयन, राष्ट्रपति का निर्वाचन प्रणाली।

कनाडा से :- संघात्मक शासन व्यवस्था।

आस्ट्रेलिया के संविधान से :- केन्द्र व राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन, समवर्ती सुची, प्रस्तावना की भाषा।

दक्षिण अफ्रीका से :- संविधान संशोधन की प्रक्रिया।

पूर्व सोवियत संघ से :- 10 मौलिक कर्त्तव्य।

जर्मनी से :- आपातकालीन उपबंध।

इस प्रकार भारतीय संविधान विभिन्न देशों द्वारा अपनाए गए उपबन्धों का श्रेष्ठ संकलन है। 

सत्य सरोज