Wednesday, 22 February 2023

बीमारी के बहाने .... ( Bimari ke bahaane ...)


 

 

बीमारी के बहाने ....

 

 

(शीर्षक को पढ़कर अन्यथा नहीं लें। इस लेख में बीमारी को बहाना का माध्यम नहीं बताया गया है। )

   ( कुछ मित्रों के व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित एक प्रेरक लेख )

 

अपने व्यस्त और भागदौड़ वाली जिंदगी में हम कई चीजों को अनदेखा कर देते हैं। दोस्तों को भुला देते हैं। रिश्तेदारों का कुशल  पूछने का हमारे पास समय नहीं होता ।  रिश्तेदारों से संबंध बढ़ाने की तो बात ही छोड़ दीजिए। आए दिन मुझे कुछ करीबी रिश्तेदारों तथा अपने परिवार के दूसरे सदस्यों के माध्यम से यह शिकायत सुनने को मिलती रहती थी कि मैंने अमुक दोस्त का फोन रिसीव नहीं किया, तो अमुक  रिश्तेदार से बात नहीं की, आदि।  मुझसे बात नहीं होने के कारण वह अपना संदेश तथा आवश्यक काम घर के किसी अन्य सदस्य को नोट करवा देते थे ताकि किसी तरह उनका संदेश मुझ तक पहुँच जाए।


प्रायः ऐसा ही होता था और संदेश पाकर मैं  उचित कार्यवाही कर देता था, लेकिन उनसे बात फिर भी नहीं हो पाती थी।  परिवार के अन्य सदस्य ही वार्तालाप का माध्यम बनते थे।  समय निकालकर एकाध  बार बात करने की कोशिश भी की तो  “नेटवर्क बिजी”  की दीवार बीच में खड़ी हो जाती थी।

 

खैर, किसी तरह रिश्तेदारी भी निभ रही थी  और पुराने दोस्त भी दोस्ती तोड़ने को तैयार नहीं थे। आए दिन उनका मिस्ड कॉल, उनको भूलते हुए मेरे मानस पटल पर अपनी ना मिटने वाली मौजूदगी दर्ज करा ही देते थे। अपने व्यस्त कार्यक्रम में यह सोच कर, कि थोड़ी देर बाद बात करूंगा या कल बात करूंगा या संडे को बात करूंगा,  करते-करते हफ्ते और महीने कब बीत जाते पता ही नहीं चलता।

 

इस व्यस्त दिनचर्या में अपने कुछ व्यक्तिगत काम भी पीछे छूट जाते थे।  अब काम तो काम है। अगर करते रहो तो कभी खत्म नहीं होता और ना करो तो कोई काम ही नहीं दिखता। खैर आदत से मैं पहली कैटेगरी में आता था। फलतः मेरा काम कभी खत्म ही नहीं होता था और व्यक्तिगत काम पीछे छूट जाते।

ऐसा कहा गया है कि शरीर और दिमाग को भी पर्याप्त आराम की जरूरत पड़ती है और अगर हम उसे आराम नहीं देते तो इसका परिणाम हमें बीमारी के रूप में मिलता है।  अगर बाकी सारे अंग ठीक से काम कर रहे हैं तो शरीर खुद को आराम देने के लिए “बुखार” को आमंत्रित करता है जो बिना कष्ट उठाए कभी भी चला आता है।

अभी परसों की ही तो बात है जब बुखार देवता बिना बुलाए ही मेरे शरीर के अंदर विराजमान हो गए थे।
आरंभ में मुझे उनका आना थोड़ा अजीब और कष्टदायक लगा। मुझे उन कामों की चिंता हो रही थी जिसका परिणाम अभी आना था तथा उन कामों की भी चिंता सता रही थी जो मैं बीमार होने के कारण नहीं कर पा रहा था।  खैर बुखार देवता जब आए थे तो उन्होंने भी अपना काम तो पूरा करना ही था। अतः वे अपने काम में लग गए।

 जैसे ही आस पास के मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों को मेरे बीमार होने का पता चला, वह मेरी कुशलता जानने मेरे घर आने लगे। प्रायः ये लोग मिठाई लेकर आते थे किंतु इस बार वह मेरे लिए तरह तरह के फल और फूल लेकर आ रहे थे। ऐसा नहीं है कि मेरे घर में इनकी कमी थी किंतु आगंतुक इसे सुदामा की तरह तुक्ष भेंट समझ कर लाते थे।

 इस आराम प्रवास के दौरान न कहीं आना–जाना था और न ही कोई मेहनत वाला काम करना थाअतः इस समय का सदुपयोग मैंने भूले बिसरे गाने सुनने में और भूले बिसरे रिश्तेदारों, मित्रों से बात करने में किया। मैं पुरानी यादों के खो गया ...

 पिछले वर्ष यात्रा के दौरान एक मित्र राकेश जी से जान पहचान हुई थी  जो समाज सेवा से जुड़े हुए हैं। उनसे मिलकर समाज के लिए कुछ करने की मेरी भी इच्छा हुई l कुछ दिनों तक तो इस विषय पर वार्तालाप होती रही  किंतु बाद में अति व्यस्तता के कारण मैं उनके संपर्क में नहीं रहा और समाज सेवा का काम ठंढे  बस्ते में चला गया।  परंतु अपने इस आराम प्रवास के दौरान मैंने इसी तरह के कुछ भूले बिसरे काम तथा लोगों को याद करने की कोशिश की और उनके साथ फोन पर वार्तालाप की । राकेश जी के साथ इसी दौरान मुलाकात भी हुई और मेरी दबी हुई इच्छा ने रफ्तार पकड़ ली।

 इस आराम प्रवास के दौरान मैंने अपने मनोरंजन के लिए अखबारों और पत्रिकाओं को अपना दूसरा साथी बनाया। अखबार में छपी गांव की एक मर्मस्पर्शी कहानी ने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया। पता करके मैंने उस लेखक का फोन नंबर प्राप्त कर लिया और उनको फोन करके इतनी अच्छी कहानी के लिए उन्हें बधाई दी। बातों- बातों में पता चला कि यह लेखक महोदय मेरे कॉलेज के दिनों के मित्र थे। लेखन में रुचि के कारण वे अखबार में रिपोर्टिंग करने लगे और धीरे-धीरे लेखक भी बन गये। उनकी कई किताबें भी छप चुकी है। उनकी इस अभूतपूर्व सफलता ने मेरे अंदर के सो चुके कलाकार को जगा दिया।

 अभी पिछले हफ्ते ही तो अमित का फोन आया था।  उसने अपनी शादी तय होने की सूचना दी थी और अपने घर बुलाया था। आदतन मैंने “अगले हफ्ते देखता हूँ”  कह कर उसे टाल दिया था। पिछले एक साल के अंदर यह सातवां -आठवां अवसर होगा किंतु अमित फोन करके घर आने का निमंत्रण देने से नहीं चूकता था। वह तो खुद आकर मुझे ले जाने को तैयार होता था किंतु मैं ही उसको आने से मना कर दिया करता था। परंतु आज ना मैं ही उसे मना कर सका और ना वो ही अपने आप को रोक सका।

 वह मेरे घर आकर मुझे “गेट वेल सून”  का संदेश के साथ पुनः अपने घर आने का निमंत्रण दे गया। ऐसे दोस्तों और रिश्तेदारों को मैं कैसे इतने दिनों से नजरअंदाज कर रहा था,  मैं खुद अचंभित था। इस आराम प्रवास ने मुझे दोस्ती और रिश्तेदारी के नए मतलब समझा दिए थे।  इसी तरह कई पुराने मित्रों और रिश्तेदारों से भी मुलाकात हुई जिससे मुझे लगा कि मेरी दुनिया तो बहुत बड़ी है। मैं ही कूप मंडूक की तरह अपने काम से बाहर नहीं निकल पा रहा हूँ।

 इसके बाद मैंने प्रण लिया कि मैं सप्ताह में एक दिन नियमित रूप से बाहर की दुनिया से भी संपर्क स्थापित करता रहूंगा।

 अपने इस  4 दिन के बीमारी के अवकाश के दौरान मैंने देखा की मेरी कुछ लेनदारी भी छूट गई थी। मोबाइल के मैसेज देखने से पता लगा की कुछ इनकम टैक्स रिटर्न आए थे तथा कुछ लोगों ने मेरे अकाउंट डिटेल मांगे थे, उन पैसों को वापस करने के लिए जिसे दे कर मैं खुद भी भूल गया था।  मेरी यह सोच थी कि किसी को जरूरत के वक्त पर अगर आप कुछ देते हैं तो उसे कहीं नोट करके ना रखें और भूल जाए कि वह पैसा वापस आएगा। अन्यथा आप दुखी रहेंगे क्योंकि देने वाला तो अपनी सुविधा अनुसार ही देगा।

 अगर हम वापसी की उम्मीद नहीं रखेंगे तो हमें दुख नहीं होगा और अगर वह धन वापस आ गया तो खुशी जरूर होगी।  इसी तरह अगर हम अन्य तरीके से भी किसी की मदद करते हैं तो उससे वापसी की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। कई बार ऐसा होता है कि जितना हमने किया होता है, उससे कई गुना ज्यादा हमारे जरूरत के समय कोई अनजान हमारी मदद कर जाता है। अतः इस वाक्य का हमेशा अनुसरण करना चाहिए कि “नेकी कर, दरिया में डाल।“

 मेरी देनदारी कोई खास नहीं थी । हाँ, कुछ इंश्योरेंस के बिल, टेलीफोन बिल, बिजली बिल इत्यादि थे जिसकी अंतिम तिथि जा चुकी थी और भुगतान नहीं हो पाया था। अतः इस अवकाश के दौरान उसका भी निवारण हो गया।

 पुराने जमाने में बुखार और कुछ अन्य बीमारियों को विधि- विधान के साथ विदा किया जाता था। किंतु जैसे-जैसे मेडिकल साइंस ने तरक्की की वैसे वैसे हम पुराने रिवाजों को भूलते चले गए। आज स्थिति ऐसी हो गई है कि बीमारी के लक्षण परिलक्षित होते ही हम एंटीबायोटिक दवा ले लेते हैं और फिर से काम में लग जाते हैं।  हम शरीर और दिमाग को आराम करने का मौका ही नहीं देते।

 विज्ञान के सताए बेचारे शरीर और दिमाग भी हमारे साथ “पैसे” और “नकली ख़ुशी” की तलाश में, अंधी और कभी न खत्म होने वाली दौड़ में शामिल हो जाते हैं। हम यह सोचना छोड़ देते हैं कि क्या हम इस तरह दौड़ते हुए अपनी मंजिल को प्राप्त कर सकते हैं?  या फिर हामारे पास यह सब सोचने का समय ही नहीं होता। कई बार हमारी महत्वाकांक्षा हमें ऐसा करने नहीं देती।

 चार दिनों तक फलाहार के बाद आज घर वालों ने “पंथ” खिला दिया है और आधिकारिक रूप से डॉक्टर ने भी फिटनेस सर्टिफिकेट दे दिया है। मेरा शरीर और दिमाग भी आराम करके फ्रेश हो चुका है और अगली पारी खेलने को तैयार है।

 आदत के अनुसार कल से मैं फिर व्यस्त हो जाऊंगा और फिर लोगों से बात हो पाएपता नहीं। अतः मैंने सोचा की “बीमारी के बहाने” मुझे जो अध्यात्मिक, पारिवारिक और सामाजिक फायदा हुआ है उसे आपको बताता चलूं और अनायास ही मेरी उंगलियों ने इसे आप तक पहुँचाने के लिए कलम का सहारा ले लिया।

                                                  ***

 

7 comments:

Anonymous said...

Bilkul sahi baat hai

Anonymous said...

Bahut hi practical baat likhi hai jo ki har Aam is Aam par fit hoti hai.👍

Anonymous said...

अति सुंदर

Santosh Kumar Yadav said...

Very Nice

Anonymous said...

Very realistic story and interesting interpretation of day to day life

Anonymous said...

Bahut badhiya

satrupa said...

उम्मीद है की पढ़ने के बाद कुछ लोगों के जीवन में परिवर्तन आया होगा।